अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में पीयूष पाचक की रचनाएँ
नई कविताएँ-

नई रचनाएँ-
चार व्यंग्य रचनाएँ

हास्य व्यंग्य में-
औरतें कुछ परिभाषाएँ
कारनामे
चार फुलझड़ियाँ
चिकने घड़े
तीन हंसिकाएँ
प्रश्नवाचक चिह्
प्रवृत्ति
प्रेम व्यथा
फ्रंट पेज पर
बस चल रही है
बीमारी
महान भारत
राजनीति
रावण के राज में
वायदों की छुरी
संयुक्त परिवार
संसद
साइज़

  रावण के राज में

मेरी नन्ही-सी
बिटिया मुनमुन,
अक्सर विचारों को
लेती है बुन,
मैंने उसे रावण का
पुतला दिखाया,
देखते ही उसने
प्रश्न दनदनाया,
"पापा, रावण अंकल के
दस सीस,
आँखें बीस,
सुबह उठकर अपनी
कौन-सी आँखें
धोते होंगे,
बेचारे बीस-बीस
आँखों से
कैसे रोते होंगे?
मैंने कहा, "बेटी,
तू नाहक विचारों में
खोती है,
रावण के राज में
रावण नहीं
प्रजा रोती है।"

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है