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संसद
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  संयुक्त परिवार

कलयुग के वन में
घर-परिवार के
संसद सदन में,
रीति रिवाज
बकवास-बंडल,
परिजन मंत्रिमण्डल,
सास के आगे बहू
दोनों की क्या कहूँ
गृह कार्य में दक्ष हैं,
सशक्त विपक्ष हैं,
उखड़े-उखड़े मन,
बाहर से समर्थन
हरकतें ठीक
वैसी की वैसी,
'लोकतंत्र'
ऐसी की तैसी
रसोइयाँ दल-बदल
रही हैं,
आधुनिकता छाती पर
मूँग दल रही है,
संयुक्त परिवार
एक सरकार,
सरकार, बस
चल रही है।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है