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  पत्ते

दिल में
यही हसरत सँजोए
शाखों से
उतर आए ज़र्द पत्ते...
और इसी उम्मीद पे
करते रहे इंतज़ार-
कि शायद
किसी शायर की नज़र पड़ जाए
उन पर
और वो किसी अफसुर्द सी ग़ज़ल का
कोई काफ़िया उनके नाम कर दे !
किसी नज़्म का
उन्वान ही दे दे...
या फिर किसी तस्बीह में
मुस्तकिल करके
ज़िक्रे -ज़िन्दगी ...
ज़िक्रे -उल्फत करे !!

८ अप्रैल २०१३

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