खिड़की की देहरी पर धूपित उपवन
धूप धूप खिड़की है धूप धूप मन
गुलमोहर की छतरी ताने राह खड़ी मुस्काए
अमलतास की झरे पंखुरी पथ में बिछ बिछ जाए
और कनेर बिछाए चादर धूप कथा दोहराए
रंग बिखेरे पछुवा डोले
उमगे घर आँगन
थाले के पानी में चिड़ियाँ खेलें और नहाएँ
आमों में पक रहे टिकोरे सुग्गे को ललचाएँ
चार गिलहरी रह रह दौड़ें और कहीं छुप जाएँ
छत पर एक कबूतर बोले
कैसे मिटे थकन
धूप धूप छत पर है
धूप धूप मन
बहुत सवेरे से सूरज की बंसी बजती जाए
एक अकेला बादल उस पर धीमी नाव चलाए
इस संगत वाली छाया में धरती तिलक लगाए
सतरंगी किरनों के माथे
सोने का चंदन