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कुछ रुबाइयाँ
कौन करता याद
कौन देता है कौन पाता है
खौफ का जो
गर हिम्मत हो
गीत तेरे

जड़ जिसने थी काटी
जहाँ उम्मीद हो ना मरहम की

जिस पे तेरी नज़र
झूठ को सच बनाइए साहब
तल्खियाँ दिल में
तेरे आने की ख़बर
तोड़ना इस देश को
दिल का दरवाज़ा
दिल का मेरे
दिल के रिश्ते
दोस्त सब जान से भी
नीम के फूल
पहले मन में तोल
फिर परिंदा चला
फूल ही फूल

फूल उनके हाथ में जँचते नहीं
बरसती घटा में
बात सचमुच
भला करता है जो
मान लूँ मैं
मिलने का भरोसा
याद आए तो
याद की बरसातों में
याद भी आते क्यों हो
ये राह मुहब्बत की
लोग हसरत से हाथ मलते हैं

वो ही काशी है वो ही मक्का है
साल दर साल

` जब शुरू में

जब शुरू में रफ्ता रफ्ता बोलता है
मुँह से बच्चे के फ़रिश्ता बोलता है

जो भी सिखला दे उसे मालिक, वही सब
कैद में मजबूर तोता बोलता है

सैर को जब आप जाते हैं चमन में
तब सुना है पत्ता पत्ता बोलता है

हूँ भले मैं पुरख़तर पर पुरसुकूं हूँ
बात ये नेकी का रस्ता बोलता है

आँकड़ों से लाख हमको बरगलाएँ
पर हकीकत हाल खस्ता बोलता है

भूल मत जाना कभी माज़ी की भूलें
वक्त ये सबका गुजिश्ता बोलता है

आइना बन कर दिखाएँ आप ‘नीरज’
सच जो होकर भी शिकश्ता, बोलता है

१ मई २०१३


 

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