अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अमित कुमार सिंह की रचनाएँ—

नई कविताएँ-
ट्रैफ़िक जाम
चेहरे पर चेहरा
ज़िंदगी ऐसे जियो
धूम्रपान - एक कठिन काम
नारी समानता - एक परिवर्तन
नेता और नरक का द्वार
प्रकृति-प्रदूषण-कलाकार
भूत

हास्य व्यंग्य में-
इंतज़ार
कौन महान

कविताओं में-
अंधकार
कौन है बूढ़ा
दीप प्रकाश‌
नव वर्ष का संदेश
नादान मनुष्य
परदेशी सवेरा
फ़र्ज़ तुम्हारा
भूख
मशहूर
माँ
माटी की गंध‌
मेरे देश के नौजवानों
यमराज का इस्तीफ़ा
रोज़‌ हमेशा खुश रहो
विवाह

  भूख

'भूख' सुनते ही होता है अहसास
किसी चाहत का, किसी कमी का
ज़िंदगी के दरवाज़े पर
बार-बार दस्तक देती
किसी आहट का।
किसी को भूख है
शोहरत की
किसी को है रोज़गार की
किसी को वासना की
तो कोई पैसों का भूखा है।
किसी को ताकत की भूख है
किसी को सेहत की
तो कोई हुस्न का दीवाना है
विलासिता का कोई
उड़ता हुआ परवाना है।
भाइयों देखो क्या आया ज़माना है।
मित्र 'अमित' तुम भी नहीं हो कम
लगी रहती है तुम्हें भी तो
लेखन की भूख हरदम।
नज़रें उठा के देखो
नहीं हो तुम अकेले
भूखों की इस नगरी में
तुमसे भी बढ़कर हैं अलबेले।
सड़क पर खड़े उस बेबस-लाचार
बूढे को देखो
फैले हुए हाथ, चेहरे की दीनता
और आंखों से छलकती
भूख को तो देखो!
उसकी ये भूख
हमारी भूख से है बिल्कुल अलग-
खुद की हड्डियों को गलाकर,
क्षुधा की अग्नि को जला कर,
कर रहा है वो
'भूख' शब्द के अर्थ को,
वास्तव में सार्थक।
16 अप्रैल
2006

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter