अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में दिनेश ठाकुर की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
ढलती शाम है
तू जबसे मेरी
मुकद्दर के ऐसे इशारे
मुद्दतों बाद
हम जितने मशहूर
हो अनजान

अंजुमन में-
आईने से
आँगन का ये साया
ज़ख्म़ी होठों पे
जाने दिल में
गम मेरा
थक कर
दूर तक
नई हैं हवाएँ
बदन पत्थरों के
रूहों को तस्कीन नहीं
शीशे से क्या मिलकर आए
सुरीली ग़ज़ल
हम दीवाने
हर तरफ़

 

आँगन का ये साया

आँगन का ये साया ये समर सूख ना जाए
पुरखों की निशानी है शजर सूख ना जाए

रिसता है लहू कैसे दिखाऊँगा मैं उनको
रस्ते में मेरा ज़ख्म अगर सूख ना जाए

हर गम से रहे दूर तू दिल तोड़ने वाले
तेरे शहर में खुशियों की नहर सूख ना जाए

लिखने हैं अभी मुझको कई दर्द जहाँ के
अल्लाह मेरी भीगी नज़र सूख ना जाए

ये जब्र का पत्थर भी पिघल जाएगा इक दिन
बस, दिल में दबी तेज़ लहर सूख ना जाए.

जो फूल खिलेगा वो तो सूखेगा यकीनन
इंसानों में खुशबू का सफ़र सूख ना जाए

३१ अगस्त २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter