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अनुभूति में दिनेश ठाकुर की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
आप का कैसा मुकद्दर
गम को पीकर
जब से हमने
मौलवी पंडित परेशा

अंजुमन में-
आईने से
आँगन का ये साया
ज़ख्म़ी होठों पे
जाने दिल में
गम मेरा
ढलती शाम है
तू जबसे मेरी
थक कर
दूर तक
नई हैं हवाएँ
बदन पत्थरों के
मुकद्दर के ऐसे इशारे
मुद्दतों बाद
रूहों को तस्कीन नहीं
शीशे से क्या मिलकर आए
सुरीली ग़ज़ल
हम जितने मशहूर
हम दीवाने
हर तरफ़

हो अनजान

  हर तरफ़ 

हर तरफ़ यूँ बड़ा झमेला है
हर कोई भीड़ में अकेला है

बदनसीबी ने खेल खेला है
आज मेरा हुनर अकेला है

उसके चेहरे का नूर क्या कहिए
जिसने हर गम ख़ुशी से झेला है

मिलते-जुलते रहो यहाँ सबसे
ज़िंदगी पल दो पल का मेला है.

अपना कोई नज़र नहीं आता
तूने किस दश्त में धकेला है

बारहा बिजलियाँ ना यूँ चमका
घर हमारा नया नवेला है

घेर रखा है रिन्दों ने कबसे
आज वाइज़ बड़ा अकेला है

३१ अगस्त २००९

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