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अनुभूति में दिनेश ठाकुर की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
आप का कैसा मुकद्दर
गम को पीकर
जब से हमने
मौलवी पंडित परेशा

अंजुमन में-
आईने से
आँगन का ये साया
ज़ख्म़ी होठों पे
जाने दिल में
गम मेरा
ढलती शाम है
तू जबसे मेरी
थक कर
दूर तक
नई हैं हवाएँ
बदन पत्थरों के
मुकद्दर के ऐसे इशारे
मुद्दतों बाद
रूहों को तस्कीन नहीं
शीशे से क्या मिलकर आए
सुरीली ग़ज़ल
हम जितने मशहूर
हम दीवाने
हर तरफ़

हो अनजान

  हम दीवाने

ख़ूं में डबोकर हम दीवाने दर्द का चारा लिखते हैं
घर की तन्हा दीवारों पर नाम तुम्हारा लिखते हैं।

तुम नाहक़ ग़म से घबराकर शाम-सवेरे रोते हो
हम अश्कों को शबनम, मोती, आँख का तारा लिखते हैं।

इस आबाद-ख़राबे में कुछ यादें हैं, कुछ खंडहर हैं
कुछ सूखे पत्तों पे मौसम कल का नज़ारा लिखते हैं।

इक न इक दिन मौजेसबा से रुख़ का आँचल सरकेगा
लिखने वाले जिसकी चितवन को महपारा लिखते हैं।

दावेदार बहुत हैं लेकिन सब कहने से डरते हैं
हम भी कब खुलकर कह पाए, नाम तुम्हारा लिखते हैं।

दुनिया में हैं लाख सुखनवर पर लोगों का कहना है
अपने-अपने नाम से सारे हाल हमारा लिखते हैं।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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