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अपनी वहशत की कसम ऐ अज़ीज़े मन
सीने से मेरे अब नहीं उठता ही धुआँ
बस जामो मीना में ढल रही है ज़िन्दगी
बस परछाइयों में बसता रहा है जहाँ

तेरी नादीद रूह से हुई थी जो परवरिश
तेरे बिसात पे मुहीत थी हसरते कमनिगाह
वो भी ज़िन्दगी का अज़ीज़े हिस्सा तो था
आज न दर्द है न कोई ख़याल न चाह

हर शाम को रास ही अपना जनूने वहदत
ज़हन मश्किल ख़याल का अब वारिस नहीं
उम्र की कश्मकश में जंगे नाउम्मीद कहाँ
संगे काबा य बुते काफ़िर पे कैसा यकीं

मैकश को सर गुज़श्त बन गया हूँ गोया
किताबे दिल से मिट गए हैं तमाम हरूफ़
हमदर्द हो तो उठा लो इक जामे मय आज
कुछ तो तुम पर भी है इस दिल को मैकूफ़

१ अप्रैल २००५

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