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  एक ज़िंदगी, तीन किरदार

इस अफ़साने के तीन किरदार हैं
मैं, तू और सच
मैं भी सच्चा था
जब मेरे इश्क में मुब्तिला था
तू भी सच्ची थी
जब से तूने तर्के-वफ़ा का फ़ैसला लिया
और सच ये है
के हम दोनों खुदगर्ज़ निकले
मैं तेरी रूह की गहराई को छू न सका
और तू मेरे पिंदार की रूह बन न सकी
अपनी-अपनी जगह सब ईमानदार हैं
इस अफ़साने के तीन किरदार हैं

मैं चाहकर भी उस बुलंदी तक न आया
तू हर हक़ीक़त को समझ बैठी है साया
हक़ीक़त और गफ़लत में फ़र्क कितना है।
ख्व़ाबों में जीना, तसव्वुर में पीना
और आख़िरश जब दर्दे-हस्ती का ज़हर लबों पे आया
लुट गया उम्र भर के सब्र का सरमाया
तड़पने दे दिल को, सब बेदार हैं
इस अफ़साने के तीन किरदार हैं

२४ मार्च २००६

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